
मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और अब कांग्रेस के महासचिव की जिम्मेदारी निभा रहे दिग्विजय सिंह इन दिनों अपने राजनीतिक बयानों, कथनों और चुटकियों से एक तरह का आंदोलन छेड़े हुए हैं। वे हर मुद्दे पर बोलते हैं, बहुत ही संक्षिप्त बोलते हैं; लेकिन उससे विवाद बड़ा खड़ा कर देते हैं।
वे कभी कहते हैं कि भाजपा ने देश में आतंकवाद की शुरूआत की, तो कभी कहते हैं कि भाजपा नचनियों की पार्टी है और उन्हें महात्मा गांधी की समाधि पर नाचने के लिए शर्म आनी चाहिए। वे पूरे दावे के साथ कहते हैं कि बाबा रामदेव ठग हैं, व्यवसायी हैं, लेकिन संन्यासी नहीं हैं, तो कभी कहते हैं कि रामदेव के पीछे संघ की साजिश है और बाबा उनके एजेंट हैं।
वे बेझिझक कह देते हैं कि बाबा रामदेव की सम्पत्ति की जांच की जाए और उन्हें जेल में डाल दिया जाए और यह पता लगाया जाए कि आखिर वे इतना पैसा लाते कहां से हैं।
वे कहते हैं कि रामदेव राजनीति में आ जाएं और कभी कहते हैं कि रामदेव के पीछे भाजपा की राजनीति है।
दिग्विजय को यह बेधड़क कहने से कोई गुरेज नहीं होता कि विश्व हिंदू परिषद राम मंदिर के नाम पर जमा किया गया चंदा खा गई और बजरंग दल सिमी से अलग नहीं है।
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज चौहान उनकी नजर में ‘कंस मामा’ हैं, तो संघ हिटलर की तरह।
दिग्विजय के बयानों का सिलसिला खत्म नहीं होता, वे हर बार एक नया मुद्दा उठाते हैं बयान देते हैं आगे बढ़ जाते हैं। बहुत हुआ तो कभी सफाई देते हैं और कभी साफ-साफ निकल जाते हैं।
बाबा रामदेव के मुद्दे पर जब कांग्रेस आलाकमान ने गैग जारी कर कहा कि कांग्रेसी नेता बाबा रामदेव के खिलाफ कुछ न कहें, तो दिग्विजय ने जैसे सुना ही नहीं और न ही उनके कानों पर जूं तक रेंगी। आलाकमान के गैग को दरकिनार करते हुए वे बोलते रहे और चुटकियां लेते रहे। या फिर कौन कहे कि खुद आलाकमान ने उन्हें उस गैग से अलग रखा हो!
आखिर क्या बात है कि दिग्विजय लगातार हर मुद्दे पर अपने बयानों से विवाद पैदा कर देते हैं? क्या यह उनकी राजनीति का अंदाज है या कांग्रेस की रणनीति? क्यों दिग्विजय केवल एक कथन से पूरी भारतीय राजनीति में खलबली मचा देते हैं और चुप हो जाते हैं।
वे ऐसे ही मुद्दे क्यों उठाते हैं, जिनसे विवाद पैदा होता है?
कांग्रेस और दिग्विजय की राजनीति वे ही जानें हम देखते हैं कि आखिर दिग्विजय की पृष्ठभूमि क्या है।
दिग्विजय सिंह दरअसल गुना जिले के राघोगढ़ रियासत में पैदा हुए राजपूत हैं, लेकिन अब उन्होंने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया है।
22 बरस की ही उम्र में राजनीति में उतरनेवाले दिग्विजय 1977 में ही कांग्रेस की ओर से विधायक बन गए थे। वे अगले तीन बरसों में ही मध्य प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री बन गए और 1985 में वे मध्य प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष भी बन गए। सन 1984 और 1991 में सांसद बने और 1993 और फिर 1998 में वे मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे।
मध्य प्रदेश में उनका कार्यकाल भी काफी विवादों से भरा रहा। उनका पहला सत्र तो राज्य को विकास की राह पर बड़ी तेजी से आगे ले गया, लेकिन दूसरे सत्र में उनकी सरकार भ्रष्टाचार और धांधलियों के आरोपों से घिर गई और 2003 में वे चुनाव हार गए। उन्होंने सार्वजनिक रूप से घोषणा की थी कि अगर वे यह चुनाव हार जाते हैं तो अगले दस बरस तक कोई चुनाव नहीं लड़ेंगे, और दिग्विजय आज तक उस वादे को निभा रहे हैं।
दिग्विजय पर 2001 में एक शराब व्यापारी से दस करोड़ रुपए की रिश्वत लेने का आरोप है। झबुआ में हुए नन बलात्कार पर भी उन्होंने हिंदू संगठन पर आरोप लगाया था, जो विवाद का केंद्र बना था।
2004 में इंदौर के एक भूमि घोटाले से भी उनका नाम जुड़ा था और उनके खिलाफ मामला दर्ज हुआ था।
2009 में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के खिलाफ टिप्पणी करने के खिलाफ उन पर मामला दर्ज किया गया था।
2009 में ही इंदौर के मॉल निर्माण में धांधली का मामला सामने आया और उसमें भी दिग्विजय का नाम था। यहां भी मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने राज्य की आर्थिक अपराध शाखा को दिग्विजय पर धांधलियों के लिए मामला दर्ज करने का निर्देश दिया।
दिग्विजय का एक पहलू यह है कि वे हमेशा हिंदू संगठनों को आड़े हाथों लेते रहते हैं, जैसे अब यही उनका मिशन हो गया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल आदि हमेशा उनके निशाने पर रहते हैं और वे इन दिनों उन्हें तथाकथित हिंदू आतंकवाद के लिए जिम्मेदार भी ठहराते रहते हैं। दूसरी ओर वे सिमी जैसे मुस्लिम संगठन पर हमेशा से उंगली उठाते आ रहे हैं।
26 नवंबर 2008 को मुंबई हमले में महाराष्ट्र आतंकवाद निरोधक दस्ते के मुखिया हेमंत करकरे की मौत पर उठे सवालों को हवा देते हुए उन्होंने कह दिया था कि करकरे ने उन्हें अपनी मौत से पहले फोन पर बताया था कि उनकी जान को हिंदू समूहों से खतरा है। यह विवाद खूब उछला, बहुत ‘तू-तू, मैं-मैं’ भी हुई। अब सवाल यह है कि क्या वे सबूतों के आधार पर राजनीति करते हैं या अपने दो टूक बयान देते हैं या फिर यूं ही कुछ भी बोलते चले जाते हैं और विवाद खड़े करते हैं? वे कहते हैं कि संघ भारत में कई आतंकवादी हमलों के पीछे जिम्मेदार है और अजमेर धमाके का आरोपी सुनील जोशी इसका सबूत है, जिसकी अब हत्या कर दी गई है; क्योंकि वह संघ के बारे में बहुत कुछ जान गया था। यह दूसरी बात है कि साध्वी प्रज्ञा ठाकुर ने दिग्विजय पर ही इल्जाम लगा दिया कि सुनील जोशी की हत्या के पीछे उनका हाथ है और मुझे फंसाने के पीछे भी उन्हीं का हाथ है।
दूसरी ओर उन पर मुस्लिम समुदाय की तरफदारी करने का आरोप भी लगाया जाता है। राजनीतिक बयानबाजी के धुरंधर खिलाड़ी दिग्विजय कांग्रेस के पक्ष से जिस तरह की भूमिका निभा रहे हैं वह शायद कांग्रेस की राजनीति का हिस्सा हो, क्योंकि कांग्रेस ने कभी भी दिग्विजय के किसी भी बयान पर आपत्ति नहीं जताई है यानी उसे दिग्विजय की जरूरत है, जो अपने ही खास अंदाज में राजनीति का एक मोर्चा संभाले हुए हैं।
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